क्रांतिवीर अवधबिहारी : मातृभूमि के लिए समर्पित एक अमर बलिदानी(14 नवम्बर 1889- 11 मई 1915)

क्रांतिवीर अवधबिहारी : मातृभूमि के लिए समर्पित एक अमर बलिदानी(14 नवम्बर 1889- 11 मई 1915)



मातृभूमि की सेवा के लिए व्यक्ति की शिक्षा, आर्थिक स्थिति या सामाजिक अवस्था कोई मायने नहीं रखती। इसका जीवंत उदाहरण हैं दिल्ली के महान क्रांतिकारी अवधबिहारी, जिन्होंने मात्र 25 वर्ष की आयु में अपने प्राण भारत माता के चरणों में अर्पित कर दिए।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

अवधबिहारी का जन्म 14 नवम्बर 1889 को दिल्ली के चांदनी चौक स्थित मोहल्ला कच्चा कटरा में हुआ था। उनके पिता श्री गोविंदलाल श्रीवास्तव का देहांत उनके बचपन में ही हो गया, जिससे परिवार पर आर्थिक संकट गहराने लगा। उनके परिवार में मां, एक बहन और वे स्वयं रह गए। अत्यधिक गरीबी के कारण कई बार उन्हें भरपेट भोजन भी नहीं मिल पाता था, परंतु वे बचपन से ही अत्यंत मेधावी थे। गणित में सदा 100 में 100 अंक प्राप्त करते और कक्षा में सदैव प्रथम आते थे।

उन्होंने छात्रवृत्ति और ट्यूशन के सहारे पढ़ाई जारी रखी और वर्ष 1908 में सेंट स्टीफेंस कॉलेज से बी.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में स्वर्ण पदक के साथ उत्तीर्ण की। इसके बाद वे लाहौर गए, जहां सेंट्रल ट्रेनिंग कॉलेज से बी.टी. की डिग्री प्राप्त की। उनकी प्रतिभा से एक अंग्रेज शिक्षक इतना प्रभावित हुआ कि उसने कहा – "ऐसे युवक अंग्रेजी शिक्षा और संस्कृति के प्रचार में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।" किंतु वह नहीं जानता था कि यही युवक भविष्य में ब्रिटिश शासन की नींव हिलाने वाला है।

अध्यापन और क्रांतिकारी पथ

शिक्षा पूरी करने के बाद अवधबिहारी ने दिल्ली के संस्कृत हाईस्कूल में अध्यापन कार्य प्रारंभ किया, परंतु सरकारी नौकरी उनके स्वाधीनता आंदोलन में बाधक बन रही थी। इसलिए उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी और लाला हनुमंत सहाय द्वारा स्थापित नेशनल हाई स्कूल में पढ़ाने लगे। यहीं पर उनकी मित्रता क्रांतिकारियों मास्टर अमीरचंद, भाई बालमुकुन्द, बसंत कुमार विश्वास आदि से हुई।

लार्ड हार्डिंग पर बम विस्फोट

23 दिसम्बर 1912 को दिल्ली में ब्रिटिश वायसराय लार्ड हार्डिंग की शोभायात्रा के दौरान इन क्रांतिकारियों ने उस पर एक भीषण बम फेंका। वायसराय उस समय हाथी पर सवार था। बम निशाने से थोड़ा चूक गया, जिससे उसकी मृत्यु तो नहीं हुई, परंतु उसके कंधे, गर्दन और शरीर के अन्य भागों पर गंभीर चोटें आईं। सरकार ने हमलावरों की जानकारी देने वाले को एक लाख रुपये का इनाम घोषित किया। अंततः एक मुखबिर दीनानाथ के कारण सभी क्रांतिकारी पकड़े गए।

मुकदमा और मृत्यु-दंड

न्यायालय में अवधबिहारी पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने बम में प्रयुक्त टोपी बसंतकुमार के साथ मिलकर बनाई थी। अन्य कई विस्फोटों में भी उन्हें संलिप्त दिखाया गया। न्यायाधीश ने निर्णय सुनाते समय कहा –
"अवधबिहारी जैसा शिक्षित और प्रतिभावान युवक किसी भी जाति का गौरव हो सकता है। यह एक साधारण व्यक्ति से हजार गुणा श्रेष्ठ है। हमें उसे फांसी की सजा देते हुए दुख हो रहा है।"

अवधबिहारी को 11 मई 1915 को फांसी दी गई।

अंतिम क्षण और अमर बलिदान

फांसी से पूर्व जब जेल अधिकारियों ने उनकी अंतिम इच्छा पूछी, तो उन्होंने कहा –
"अंग्रेजी साम्राज्य का नाश हो।"
जेल अधिकारी ने कहा, “जीवन की अंतिम वेला में कुछ तो शांति रखो।”
इस पर अवधबिहारी ने उत्तर दिया –
"कैसी शांति? मैं तो चाहता हूं कि भयंकर अशांति फैले, जिससे यह विदेशी शासन और भारत की गुलामी भस्म हो जाए। क्रांति की आग से भारत कुंदन होकर निकले। हमारे जैसे हजार-दो हजार युवक बलिदान हो भी जाएं, तो क्या?"

यह कहकर उन्होंने "वन्दे मातरम्" का जयघोष किया और फंदे को चूमकर हंसते हुए बलिदान हो गए।

जहां उन्हें फांसी दी गई, आज वहां मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज स्थित है – जो इतिहास की मूक दीवारों में उनके बलिदान की गूंज आज भी समेटे हुए है।


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