क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा: स्वतंत्रता संग्राम के युवा दीपस्तंभ(24 मई 1896- 16 नवम्बर 1915)

क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा: स्वतंत्रता संग्राम के युवा दीपस्तंभ(24 मई 1896- 16 नवम्बर 1915)


पारिवारिक पृष्ठभूमि और प्रारंभिक शिक्षा

करतार सिंह सराभा का जन्म 24 मई 1896 को पंजाब के लुधियाना जिले के सराभा नामक गाँव में हुआ। वे एक सम्पन्न जमींदार परिवार से थे। बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया, और उनका पालन-पोषण उनके दादा ने किया। करतार सिंह अत्यंत होशियार और आत्माभिमानी बालक थे। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने लुधियाना में प्राप्त की, और उच्च शिक्षा के लिए मात्र 16 वर्ष की आयु में अमेरिका चले गए।

अमेरिका में छात्र जीवन और राष्ट्रवाद की जागृति

करतार सिंह ने अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले में रसायन शास्त्र (Chemistry) में अध्ययन प्रारंभ किया। परंतु अमेरिका में भारतीय मजदूरों की दुर्दशा और वहाँ के नस्लवादी व्यवहार ने उन्हें गहराई से झकझोर दिया। वे भारत माता की परतंत्रता के मूल कारणों को समझने लगे।

ग़दर पार्टी से जुड़ाव: 1913 में अमेरिका में भारतीय प्रवासियों द्वारा गठित ग़दर पार्टी के साथ वे सक्रिय रूप से जुड़ गए। पार्टी का लक्ष्य भारत को सशस्त्र क्रांति द्वारा स्वतंत्र कराना था। करतार सिंह न केवल एक सदस्य बने बल्कि वह इस पार्टी के सबसे उत्साही, निडर और प्रेरक नेताओं में गिने जाने लगे।

 ‘ग़दर’ समाचार पत्र का प्रकाशन और प्रचार

ग़दर पार्टी ने “ग़दर” नामक अख़बार निकाला जो उर्दू, पंजाबी, हिंदी, और अंग्रेज़ी में प्रकाशित होता था। करतार सिंह इस पत्र के सम्पादन, लेखन, मुद्रण और वितरण में सक्रिय थे। इसमें क्रांतिकारी विचार, औपनिवेशिक शासन की आलोचना, और देशवासियों से आज़ादी के लिए संघर्ष करने का आह्वान होता था।

उनकी कविताएं और लेख युवाओं में क्रांति की ज्वाला फूंकते थे। एक प्रसिद्ध कविता:

"मिट जाओ अपने देश पर, नाम अमर हो जाएगा
मरते-मरते भी कोई काम असर हो जाएगा…"

भारत वापसी और ग़दर क्रांति की योजना (1914-15)

1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ और ग़दर पार्टी ने इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांति का अवसर माना। हजारों भारतीय प्रवासी अमेरिका, कनाडा और एशिया से भारत लौटे ताकि ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया जा सके।

करतार सिंह भी अपने कई साथियों के साथ भारत लौटे। उन्होंने पंजाब में हथियारों की व्यवस्था, सैन्य विद्रोह और जन-उत्थान की योजनाओं का नेतृत्व किया। उनका उद्देश्य ब्रिटिश सेना के भारतीय सिपाहियों को विद्रोह के लिए प्रेरित करना था।

 विश्वासघात और गिरफ्तारी

अंग्रेज़ी खुफिया विभाग को ग़दरियों की योजना की भनक लग चुकी थी। एक मुखबिर की सूचना पर करतार सिंह समेत कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बावजूद उन्होंने पुलिस हिरासत में भी अत्यंत दृढ़ता और साहस दिखाया।

 लाहौर षड्यंत्र केस और अदालती कार्यवाही

करतार सिंह पर 1915 में लाहौर षड्यंत्र केस के अंतर्गत मुकदमा चलाया गया। अदालती कार्यवाही के दौरान उनके तेजस्वी उत्तर और निर्भीक रवैये ने सबको चकित कर दिया।

उनके शब्दों में:

“मैं जानता हूँ कि मुझे फाँसी होगी। यदि मुझे फाँसी नहीं दी गई, तो मैं स्वतंत्र भारत के लिए फिर से क्रांति करूँगा।”

उनकी निडरता ने जज को भी स्तब्ध कर दिया।

 शहादत: 16 नवम्बर 1915

करतार सिंह सराभा को 16 नवम्बर 1915 को लाहौर जेल में फांसी दी गई। वे मात्र 19 वर्ष, 5 महीने के थे — भारत की स्वतंत्रता संग्राम में सबसे कम उम्र के शहीदों में एक।

 करतार सिंह सराभा की प्रेरणा: भगत सिंह

भगत सिंह करतार सिंह को अपना आदर्श मानते थे। उन्होंने एक बार कहा था:

“करतार सिंह सराभा मेरे गुरु हैं। उनकी तस्वीर मैं हमेशा अपनी जेब में रखता हूँ।”

युवा क्रांतिकारियों की पूरी पीढ़ी उनके बलिदान से प्रेरित हुई।

 स्मृतियाँ और सम्मान

  • पंजाब में कई शिक्षण संस्थान, सड़कों और स्मारकों का नाम उनके नाम पर है।
  • सराभा गाँव को "क्रांति की भूमि" माना जाता है।
  • भारत सरकार ने उनके नाम पर डाक टिकट भी जारी किया।

उपसंहार:

करतार सिंह सराभा का जीवन एक जीवंत उदाहरण है कि राष्ट्रभक्ति उम्र की मोहताज नहीं होती। उनकी ज्वलंत आत्मा, निडरता और बलिदान भारतीय इतिहास के अमर अध्याय हैं। वे आज भी युवाओं में राष्ट्रसेवा, बलिदान और न्याय के प्रति अद्भुत प्रेरणा का स्रोत हैं।


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